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लड़कियों जैसा होने के कारण स्कूल में बड़ा परेशान करते थेI

"देखो ये तो लड़कियों जैसा है!" वैसे सिद्धांत को यह समझ ही नहीं आता था कि आखिर लड़की की तरह दिखने में क्या गलत था, फिर भी वो चाहता था कि लोग उसे देखकर यह कहना बंद कर देI लव मैटर्स इंडिया के साथ हुई बातचीत के दौरान उसने बताया कि कैसे अंततः उसने अपनी लैगिकता को समझा और उसे स्वीकार किया।

सिद्धांत टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज में मास्टर्स का छात्र है। उसने हाल ही में लड़कों के लिए सेक्स शिक्षा पर एक विस्तृत पाठ्यक्रम विकसित किया हैI पुरुषों और पुरुषत्व से जुड़े कार्य करने में उसे खासी रूचि हैI

दुःख और गुस्सा

एक बार जब मैं स्कूल की तरफ से माउंटेन बाइकिंग यात्रा पर था तब किसी ने पहली बार मुझे ‘छक्का’  कह कर बुलाया था। उस समय मैं सोलह साल का था और तब मुझे यह पता नहीं था कि इसका क्या जवाब दूँI यहां तक कि मैं तो ये भी नहीं समझ पा रहा था कि उन लोगों की भाषा ही वैसी थी या उसने जान बूझकर मुझे दुःख पहुंचाने के लिए ऐसा बोला था।

मैं बस यही सोचने लगा कि जल्दी से यह ट्रिप ख़त्म हो। मैं उनसे बचने की कोशिश करता लेकिन किसी ना किसी तरह वो मुझे पकड़ कर किसी कोने में ले जाकर परेशान करते थे। मुझे ख़ुद से चिढ होने लगी क्योंकि मैं अपने आपको उनके चंगुल से बचा नहीं पा रहा था। जब यात्रा समाप्त हुई तो यह सोच कर मैंने राहत की साँस ली कि इस बात को जल्द ही भुला दिया जाएगा।

मेलजोल बढ़ाने के लिए खुद पर व्यंग्य

लेकिन मैं गलत था। जैसे ही मैं स्कूल आया मेरे क्लास के बाकी लड़के भी मुझे लड़कियों के नाम से चिढ़ाने लगे। वे मेरी तरफ देखकर हाथ टेढ़ा करके ऐसे भद्दे इशारे किया करते थे जैसा आमतौर पर हिंदी फिल्मों में समलैंगिकों के लिए दिखाया जाता है।

हालांकि इस नक़ल ने मुझे इतना परेशान नहीं किया, जितना की उनकी हंसी मुझे दुःख पहुंचाती थी। उन्हीं लड़कों ने यह बात हर जगह फैला दी कि मैं समलैंगिक हूँ। इस वजह से मैंने अपने आस-पास के लोगों से बात करना बंद कर दिया, खुद सबसे अलग रहने लगा और मुझे लगने लगा कि मैं दूसरों के लिए ठीक नहीं हूँ। मैंने सब लोगों के बीच में घुलने मिलने की पूरी कोशिश की यहां तक कि मैं समलैंगिक लोगों से जुड़े मजाक भी करने लगा।

लड़कियों वाले काम?

समस्या तब और बढ़ गयी जब लोगों को पाता लगा कि मुझे वो करना ज़्यादा पसंद है जो आमतौर पर लडकियां करती हैंI मैं खेलने की बजाय बात करना ज्यादा पसंद करता था यहां तक कि मुझे खाना बनाने में बहुत मज़ा आता था। जब मैंने लोगों से कहा कि मैं शेफ बनना चाहता हूँ, तो वे ये कह कर मज़ाक उड़ाते कि ये सब 'लड़कियों वाले काम' हैं।  मैं इस तरह की फ़ालतू बातों को अनदेखा करने लगा क्योंकि मुझे पता था कि दुनिया के बेहतरीन शेफ पुरुष और महिला दोनों ही हैं। मैंने उनसे कहा कि यह मेरी व्यक्तिगत पसंद थी और किसी को भी इससे हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए। कई बार बहस यहीं पर आकर ख़त्म हो जाती थी।

जो प्राकृतिक है उसे अपनाओ

स्कूल खत्म हुआ तो मुझे आशा थी कि कॉलेज में मेरे शारीरिक हाव भाव से मेरी लैंगिक पहचान को नहीं जोड़ा जाएगा और मुझे इन लड़कियों वाले नामों से नहीं बुलाया जाएगा। सौभाग्य से, मेरे कॉलेज का माहौल बहुत अच्छा था, मेरे आस पास के दोस्तों ने मुझे वैसे ही स्वीकार किया जैसा मैं था और मुझे लिंग और लैंगिकता से जुड़ी कई गंभीर बातें समझायीं

इस दौरान, मुझे एक गैर-लाभकारी संगठन से भी मिलवाया गया जो लैंगिकता पर काम करता था। डेढ़ साल तक इस संगठन के साथ जुड़े रहने के कारण मुझे अपने आप को बेहतर तरीके से समझने में और आत्मविश्वास विकसित करने में बहुत मदद मिली ।

मुझे एहसास हुआ कि जब लोग मुझे समलैंगिक बुलाएं तो मुझे इससे परेशान होने की कोई ज़रुरत नहीं है। समलैंगिकता पूरी तरह से प्राकृतिक है और यदि कुछ गलत या अप्राकृतिक है, तो यह उनकी सोच है। मुझे यह भी एहसास हुआ कि 'स्त्री के जैसा होने' में शर्मिंदा होने वाली कोई बात नहीं है। मैं जैसा भी हूँ उसे मुझे पूरे दिल से अपनाना चाहिए।

मैंने ख़ुद को पाया

आज एक समलैंगिक होते हुए मुझे एक ऐसा समुदाय मिला है जहाँ मैं सबको अपने जैसा ही पाता हूँ। यहां मैं जैसा हूँ वैसा ही मुझे स्वीकार किया गया, किसी ने मुझे लैंगिकता बदलने या चाल चलन बदलने के लिए दवाब नहीं डाला। अब बिना कोई राय बनाये मैं अपने शरीर और कामुकता को बेहतर तरीके से समझ सकता हूँ। अगर कोई दूसरा बिल्कुल मेरे जैसी स्थिति या भेदभाव के दौर से गुज़र रहा है तो मैं पूर्णरूप से उसके सहयोग और मदद के लिए तैयार रहता हूँ।

 

*गोपनीयता बनाये रखने के लिए नाम बदल दिए गये हैं और तस्वीर में मॉडल का इस्तेमाल किया गया है।

क्या आपके हाव भाव को लेकर कभी आपको स्कूल में परेशान किया गया? हमारे फेसबुक पेज पर लव मैटर्स (एलएम) के साथ उसे साझा करें। यदि आपके पास कोई विशिष्ट प्रश्न है, तो कृपया हमारे चर्चा मंच पर एलएम विशेषज्ञों से पूछें।

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