LGBT issues and problems
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LGBTQIA+ समुदाय के लिए ज़िंदगी अभी भी मुश्किल

यूँ तो 2018 में समलैंगिक संबंधों को भारत में वैध करार दिया गया, भारत के LGBTQIA + समुदाय की मुश्किलें पूरी तरह से ख़त्म नहीं हुई हैं। अभी बहुत से मुद्दे हैं जहां उन्हें विषमलैंगिक लोगों के मुकाबले आये दिन भेद-भाव और मुश्किलों का सामना करना पड़ता हैं। क़ानूनन शादी न कर पाने से लेकर किराये पर घर लेने तक, हर बात के लिए जद्दोजहद करनी पड़ती हैं। आइए जानते हैं 2018 की उस बड़ी जीत के बाद भारत के LGBTQIA + समुदाय को अब भी किन मुद्दों पर पूर्ण अधिकार या आज़ादी नहीं हैं।

सांस्कृतिक और सामाजिक भेदभाव

LGBTQIA + समुदाय को अभी भी हर कदम पर सांस्कृतिक और सामाजिक भेदभाव से जूझना पड़ रहा है। लोगों के बीच समलैंगिक के रूप में स्वीकृति अभी भी एक बड़ी चुनौती बनी हुई है। बहुत से परिवार भी अपने समलैंगिक और ट्रांसजेंडर बच्चों को स्वीकार नहीं करते। या तो उन्हें अपनी इच्छाओ को दबा कर 'नार्मल' ज़िन्दगी जीने के लिए मजबूर किया जाता हैं या फिर घर-परिवार से रिश्ता तोड़ना पड़ता है। बदलाव आ भी रहा हैं तो बहुत धीरे।  

इसके अलावा अभी भी बुनियादी सुविधाएं या अधिकार  समुदाय के लोगो के लिए बराबरी से उपलब्ध नहीं हैं, जैसे कि रोज़गार के समान अवसर, किराये पर घर आसानी से मिलना, ट्रांसजेंडरों के लिए अलग बाथरूम की व्यवस्था आदि। इसके अलावा उन्हें यौन उत्पीड़न, जबरन लिंग परिवर्तन और अनचाही सर्जरी (दबाव में आकर ट्रांस लोगों द्वारा लिंग-परिवर्तन प्रक्रिया के लिए तैयार होना) की चुनौतियों से भी निपटना पड़ता है।

भले ही समलैंगिकता अब अपराध की दृष्टि से न देख जाता हो , लेकिन हमारे समाज में इस समुदाय के खिलाफ अभी भी बहुत भ्रांतियों हैं, जिन्हे दूर करने के लिए अभी बहुत काम किए जाने की आवश्यकता है। अभी भी LGBTQIA + को ऑनलाइन और ऑफलाइन बहुत सारे भेदभाव, आलोचना और उपहास का सामना सिर्फ इसलिए करना पड़ता है क्योंकि समय के साथ लोगों के नज़रिये और सोच में बदलाव आना अभी बाकी है।

सेम-सेक्स मैरिज (समलिंगी विवाह) को कानूनी रूप से मान्यता प्राप्त नहीं है

भारत में समान लिंग सेे विवाह को कानूनी रूप से वैध नहीं माना जाता है। न तो ये जोड़े डोमेस्टिक पार्टनर शिप (कानूनी रूप से एक साथ रहने) और न ही सिविल यूनियन (विवाह के समान अधिकारों के साथ  कानूनी रूप से मान्यता प्राप्त साहचर्य) के अधिकारों का दावा कर सकते हैं। हालांकि समान-लिंग के साथ विवाह अभी भी कोई आपराधिक कार्य नहीं है। मतलब कि अगर आप समान लिंग वाले व्यक्ति से विवाह करते हैं तो आपको जेल या सजा नहीं होगी लेकिन इस तरह के संबंधों की कानून की नजर में कोई अहमियत नहीं है।

चूंकि ऐसे विवाह को कानूनी रूप से वैध नहीं माना जाता है इसलिए समलैंगिक जोड़े भले ही विवाह कर लें लेकिन विषमलैंगिक जोड़ों के समान विशेषाधिकार का दावा नहीं कर सकते हैं। 

गोद लेने या सरोगेसी का कोई अधिकार नहीं

जब से समलैंगिकता को कानूनी रूप से अवैध साबित करने के प्रयास किये जाने लगे तब से कई कार्यकर्ताओं और समुदाय के लोगों ने विवाह और अभिभावक का नागरिक अधिकार प्राप्त करने के लिए याचिका दायर की है। लेकिन अभी तक इस मुद्दे पर कोई निर्णय नहीं आया है।

हाल ही में सरोगेसी (जहां एक महिला दूसरे जोड़े के बच्चे को जन्म देने के लिए सहमत है) और समान लिंग के जोड़ों के लिए गोद लेने के अधिकार के लिए दायर एक समीक्षा याचिका (मौजूदा याचिका पर फॉलोअप अपील) को सुप्रीम कोर्ट ने अगस्त 2019 में खारिज कर दिया। देश की शीर्ष अदालत ने अपने दावे में याचिका को ‘अयोग्य’ पाया है।

सीमित स्वास्थ्य बीमा और इंश्योरेंस एवेन्यू

कुछ समय पहले तक बीमा क्षेत्र की किसी भी प्रमुख कंपनी ने समलैंगिक जोड़ों के लिए कोई स्वास्थ्य या जीवन बीमा पॉलिसी की शुरूआत नहीं की थी। हालांकि, चीजें धीरे-धीरे ही सही लेकिन अब बदलने लगीं हैं। 2019 में गोदरेज ग्रुप, सिटीग्रुप, एसबीआई जनरल इंश्योरेंस और आदित्य बिड़ला ग्रुप जैसी कई कंपनियों ने समान लिंग वाले जोड़ों के लिए स्वास्थ्य बीमा पॉलिसियों की शुरूआत की है।

भले ही इसके खिलाफ कोई कानूनी प्रावधान नहीं है, फिर भी अधिकांश बीमा कंपनियां कानूनी रूप से अविवाहित पार्टनर (लिव-इन पार्टनर्स) को बीमा कवरेज प्रदान नहीं करती हैं भले ही उनका लैंगिक झुकाव कुछ भी हो (यह प्रावधान विषमलैंगिक और समलैंगिक दोनों जोड़ों के लिए लागू होता है)।

चूंकि समान-लिंग विवाहों को कानूनी मान्यता प्राप्त नहीं है, इसलिए यह धारा समलैंगिक जोड़ों को अपने बीमा पॉलिसियों के लाभार्थियों (Beneficiaries) के रूप में अपने पार्टनर का नाम जोड़ने से रोकती है।

सीमित वित्तीय अधिकार

समलैंगिक लोगों के वित्तीय अधिकार भी सीमित हैं। विषमलैंगिक विवाहित पति-पत्नी एक-दूसरे की संपत्ति और धन दौलत बिना किसी टैक्स लायबिलिटी के गिफ्ट के रूप में दे सकते हैं (ये गिफ्ट टैक्स से मुक्त हैं)।  LGBTQIA + जोड़ों केलिए यह अधिकार 50,000 रुपये तक सीमित है। वे संपत्ति या अन्य प्रॉपर्टी खरीदने के लिए जॉयंट लोन के लिए भी आवेदन नहीं कर सकते हैं।

इसके अलावा वंशानुगत कानून (inheritance law - जिसमें किसी व्यक्ति की मृत्यु की स्थिति में किसी अन्य व्यक्ति को संपत्ति, धन, ऋण और दायित्वों का हक देना शामिल है) समान लिंग वाले जोड़ों पर लागू नहीं होता है। एक पार्टनर की मृत्यु होने पर दूसरे को मृतक साझेदार की संपत्ति विरासत में नहीं मिलती है। एक दूसरे के वित्तीय भविष्य को सुरक्षित करने का एकमात्र तरीका यही है कि आप पहले से ही अपनी वसीयत लिख कर रखें।

लैंगिक पहचान का संकट

धारा 377 खारिज होने के बाद भारत सरकार ने ट्रांसजेंडर पर्सन (अधिकारों का संरक्षण) बिल पारित किया। हालांकि बिल की अपनी सीमाएं हैं और यह ट्रांस लोगों के अधिकारों के सुरक्षा के मामले में पूरी तरह खरा नहीं उतरता है। उदाहरण के लिए, इस बिल के तहत सुरक्षा की पात्रता के लिए एक ट्रांस व्यक्ति को जन्म प्रमाण पत्र, ड्राइविंग लाइसेंस, आधार कार्ड, पासपोर्ट जैसे सभी कानूनी दस्तावेज़ों में अपना लिंग बदलना पड़ता है। इसके लिए जिला मजिस्ट्रेट से ट्रांसजेंडर प्रमाण पत्र जारी कराने की आवश्यकता होती है। इस प्रमाण पत्र को प्राप्त करने के लिए व्यक्ति को किसी सक्षम मेडिकल अथॉरिटी (डॉक्टर या सर्जन) द्वारा हस्ताक्षर किये हुए ‘लिंग-परिवर्तन सर्जरी’ के प्रमाण पत्र की आवश्यकता होती है।

एक तो ये सर्जरी काफी महंगी हैं और स्वास्थ्य बीमा पॉलिसियों द्वारा कवर नहीं की जाती हैं, दूसरा ट्रांस आबादी के लिए रोज़गार के सीमित अवसर उपलब्ध हैं, इन सब बातों के चलते इस प्रमाण पत्र के मिलने की संभावनाएं काफी कम  हो जाती हैं। इसके अलावा यह किसी के लैंगिक पहचान का अधिकार भी छीन लेता है।

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आरुषि चौधरी एक फ्रीलैंस पत्रकार और लेखिका हैं, जिन्हें पुणे मिरर और हिंदुस्तान टाइम्स जैसे प्रिंट प्रकाशनों में 5 साल का अनुभव है, और उन्होंने डिजिटल प्लेटफॉर्म और प्रिंट प्रकाशनों के लिए लगभग एक दशक का लेखन किया है - द ट्रिब्यून, बीआर इंटरनेशनल पत्रिका, मेक माय ट्रिप , किलर फीचर्स, द मनी टाइम्स, और होम रिव्यू, कुछ नाम हैं। इतने सालों में उन्होंने जिन चीजों के बारे में लिखा है, उनमें से मनोविज्ञान के प्रिज्म के माध्यम से प्यार और रिश्तों की खोज करना उन्हें सबसे ज्यादा उत्साहित करता है। लेखन उनका पहला है। आप आरुषि को यहां ट्विटर पर पा सकते हैं।

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