Teri Meri Love Story
Srushti Mahamuni

जब नैन्सी मेट वेंकट

द्वारा Srushti Mahamuni अप्रैल 27, 02:16 बजे
श्रुति महामुनी आज हमारे पाठकों के लिए अपने माता-पिता की ऐसी हिंदू-ईसाई प्रेम कहानी लेकर आयी हैं जो बिलकुल एक लोकप्रिय बॉलीवुड फ़िल्म 'एक दूजे के लिए' से प्रेरित लगती है!

पहली नज़र का प्यार

नैन्सी* - एक शर्मीली लेकिन बलां की खूबसूरत लड़की थी जिसे 16 साल की उम्र में वेंकट से प्यार हो गया थाI वेंकट के बारे में क्या कहें - 21 साल का वेंकट, स्वभाव से उतावला, बेहद बहादुर और बेधड़क नौजवान था जो पुणे में रहता थाI बात है 1981 की, वही साल जिस साल एक दूजे के लिए रिलीज़ हुई थीI

नैन्सी एक सख्त मध्यवर्गीय कैथोलिक दक्षिण भारतीय परिवार में जन्मीं एकमात्र बेटी थीं। उसे फिल्में देखने का इतना शौक था कि वो घर में बिना किसी को बताये चुपचाप अपने कमरे में धीमी आवाज़ करके पूरी पूरी रात फिल्में देखा करती थीI वेंकट का जन्म एक ब्राह्मण महाराष्ट्रीयन परिवार में हुआ थाI वो पांच बच्चों में तीसरे नंबर पर थाI उसके पास फिरोज़ी रंग की एनफील्ड मोटरसाइकिल थी और उस पर बैठकर उसे सरपट पुणे से बॉम्बे लेकर जाने में वेंकट को खूब मज़ा आता थाI

साल 1981 में नैन्सी अपनी गर्मियों की छुटियों में अपने चचेरे भाई-बहनों के घर, मुंबई आयी हुई थीI एक दिन उन लोगों ने अपना पूरा दिन स्विमिंग पूल पर बिताने का फैसला कियाI उन लोगों के वहां पहुँचने से पहले ही वेंकट पानी के अंदर था और जैसे ही उसने नैन्सी को देखा, वो उस पर लटटू हो गयाI

प्यार की शुरुआत

वेंकट अभी यही ख्याल बुन रहा था कि कैसे इस लड़की से बात करे कि उसके कानों में एक आवाज़ गूंजी, 'वेंकट मेरे मामा की बेटी से मिलोI यह नैन्सी है और यहाँ अपनी गर्मियों की छुट्टियां बिताने के लिए आयी हैI इतने पास से नैन्सी को देखकर तो वेंकट की होश ही उड़ गए थेI उड़ते भी क्यों ना, नैन्सी की शकल हूबहू उसकी पसंदीदा अभिनेत्री रेखा की तरह जो थीI'

दोनों ने एक दूसरे से 'हाय-हेलो' किया और जल्द ही दोनों को ही यह एहसास हो गया कि वे एक दूसरे के बारे एक जैसे विचार रखते हैंI पूरी शाम उन्होंने पूल में पैर लटकाये एक दूसरे से बातें करते हुए बिता दी - जैसे ना जाने कितने पुराने दोस्त हों!

साल 1983 आते आते वे दोनों एक दूसरे के प्यार में पागल हो चुके थेI नैन्सी को कॉलेज से लेकर अपनी मोटरसाइकिल पर बिठाकर लम्बी ड्राइव पर लेकर जाना वेंकट का रोज़ का सबसे ज़रूरी काम बन चुका थाI नैन्सी भी उससे दीवानों की तरह प्यार करती थीI आखिर उसे उसमे एक सच्चा प्रेमी, दोस्त और उसका बेहद ख्याल रखने वाला जो मिला थाI

नैन्सी के साथ जीवन बिताना, वेंकट के नौकरी ढूंढने के पीछे सबसे बड़ी प्रेरणा थीI वो शादी के लिए उसका हाथ मांगने से पहले अपने जीवन में कुछ बन जाना चाहता थाI

अलगाव

वेंकट को एक बढ़िया नौकरी तो मिली लेकिन एक समस्या थीI उसे नौकरी के लिए इंदौर जाना पड़ रहा थाI

लेकिन जब उसने नैन्सी को इसके बारे में बताया, तो उसने वेंकट का पूरा समर्थन किया और कहा कि उसे यह नौकरी ज़रूर करनी चाहिएI और ऐसे शुरू हुआ इन दोनों का लम्बी दूरी का प्यारI एक ऐसे युग में जहाँ ना इंटरनेट था, ना व्हाट्सप्प और ना ही मोबाइल फ़ोन!

महीने में एक बार नैन्सी अपनी जेबखर्ची से पैसे बचाकर पास के फ़ोन बूथ से वेंकट को पांच मिनट की कॉल करती थीI उनके रिश्ते की पूरी बुनियाद हाथों से लिखे पत्रों पर टिकी थीI (जी हाँ सही पढ़ा आपने, हाथ से लिखे पत्र)

हां या ना?

ऐसे ही एक पत्र में, वेंकट ने नैन्सी से पूछा चलो इस बार तुम्हारे जन्मदिन, 4 अक्टूबर को शादी कर लेते हैंI पढ़ते ही नैन्सी के दिल से ज़ोर से आवाज़ आयी - हां हां हां! वो ज़ोर से चिल्लाकर यह बात सबको बता देना चाहती थी, लेकिन उसे लगा कि यह बात उसे वेंकट को फ़ोन पर बतानी चाहिएI यह ख्याल आते ही वो झट से पास वाले फ़ोन बूथ की ओर भागीI

लेकिन बाहर उसकी माँ उसका रास्ता रोके खड़ी थीI उनके हाथ में थे वो अनगिनत 'लव लेटर्स' जो उन्हें अपने बिटिया के कमरे की सफ़ाई करते हुए मिले थेI यह कहना गलत नहीं होगा कि वो गुस्से में थी और शायद उन्हें यह भी लग रहा था कि उनकी बेटी ने उन्हें धोखे में रखा हैI ज़ाहिर सी बात है कि उन्हें अपनी बेटी को सबक सिखाना था और उसके लिए उन्होंने नैन्सी को एक हफ्ते के लिए कमरे में बंद करने का फैसला कर लियाI

पत्र भेजे हुए वेंकट को दो हफ़्ते से ज़्यादा हो गए थे और नैन्सी की तरफ़ से कोई जवाब नहीं आता दिख रहा थाI पहले हो रही बैचैनी की जगह अब चिंता ने ले ली थीI उसे लग रहा था कि उससे कुछ गलत तो नहीं हो गया? कहीं वो कुछ ऐसा तो नहीं कह गया जो उसे नहीं कहना चाहिए था? कहीं नैन्सी किसी मुसीबत में तो नहीं है? वो किसी भी चीज़ पर ध्यान केंद्रित नहीं कर पा रहा थाI खाना-पीना तो दूर की बात है वो ठीक से सो भी नहीं पा रहा थाI

मुलाक़ात/मुक्का-लात

 जब इस बात को एक हफ़्ता और गुज़र गया तो वेंकट से और इंतज़ार नहीं हुआI वो पुणे की बस लेकर सीधे नैन्सी के घर पहुँच गयाI दरवाज़े पर पहुंचा तो उसका दिल ज़ोरो से धड़क रहा थाI कांपते हाथों से उसने घंटी बजायीI एक लम्बे, काले आदमी ने दरवाज़ा खोलाI वो नैन्सी के पिता थेI "क्या चाहिए?", उन्होंने पूछाI सर 'मैं आपकी बेटी से प्यार करता हूं और उससे शादी करना चाहता हूं'I इस बात का जवाब नैन्सी के पिता ने मुंह की बजाय अपने हाथो से देना बेहतर समझाI कानों के बजाय वेंकट को जवाब उसके गाल पर सुनाई दियाI एक ज़ोरदार थप्पड़ के रुप में!

तुम्हारी हिम्मत भी कैसे हुई यह सोचने की, कि मैं अपनी बेटी की शादी एक हिंदू से करूंगाI चले जाओ यहाँ से! 'अगले कुछ हफ्तों तक नैन्सी के पिता उसे कॉलेज लेकर जाते थे और उसकी मां उसे वापस लेकर आती थीI

कुछ हफ़्ते और गुज़रे और वेंकट को अपनी नौकरी के लिए वापस जाना पड़ाI जब नैन्सी के घर में हालात सुधरे तो उसने वेंकट को फ़ोन किया और उसे बताया कि वो कितनी बुरी तरह उससे प्यार करती है और उससे शादी करना चाहती हैI

असली डी डी एल जे 

दिक्कत सिर्फ़ नैन्सी के परिवार में ही नहीं थीI वेंकट का परिवार भी एक कैथोलिक लड़की को अपने बहु के रूप में नहीं देखता थाI 'वो तेरे बच्चों को क्या सिखाएगी? हमारे घर के संस्कारों में कैसे ढलेगी? वो तो मराठी भी नहीं बोलती और सब से बड़ी बात कि वो ईसाई है। '

तो दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे के 'राज-सिमरन' की तरह मेरे माता-पिता ने भी शादी करने से पहले एक-दूसरे के परिवारों के दिल जीतने का फैसला कियाI लेकिन यह इतना आसान नहीं होने वाला थाI

प्यार की जीत, आखिरकार

चार साल के बाद, उन दोनों के परिवार सहमत हुए तो लेकिन एक शर्त पर - नैन्सी को हिन्दू धर्म अपनाना पड़ेगा, वहीँ वेंकट को एक ईसाई में परिवर्तित होना पड़ेगा, तभी वे लोग उनकी शादी के लिए तैयार होंगेI

अपने प्यार की तरह वे दोनों एक और बात पर भी अडिग थेI धर्मपरिवर्तन कोई नहीं करेगाI उन्होंने लड़ने और इंतजार करने का फैसलाI उन्हें विश्वास था कि एक ना एक दिन उनके प्यार की जीत होगीI

और वही हुआI दो और साल गुजरने के बाद 1989 में उनके परिवारवालों ने हथियार दाल दिए और उन्हें उनके प्यार के आगे झुकना पड़ाI कहाँ एक बार होती नहीं दिख रही रही थी और कहाँ वेंकट और नैन्सी की दो बार शादी हुई - 4 अक्टूबर को एक ईसाई समारोह में नैन्सी के जन्मदिन वाले दिन और अगले दिन एक हिंदू समारोह मेंI

पहली मुलाकात के सात साल और 83 दिनों के बाद अंततः मेरे माता-पिता परिणय सूत्र में एक दूसरे से हमेशा हमेशा के लिए बंध  गएI शादी के वचन पढ़ते हुए उन्होंने मन ही मन एक और वचन भी लिया, कि वे अपने बच्चों के साथ ऐसा कुछ नहीं होने देंगे और उनकी परवरिश बिलकुल अलग तरीके से करेंगेI

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