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कोरोनावायरस महामारी - आपके सवालों के जवाब

लव मैटर्स इंडिया ने कोरोनावायरस महामारी से जुड़े सवालों के विषय में देश भर में पांच युवा परामर्श आयोजित किए। इन परामर्शों में, कॉलेज के छात्रों के साथ महामारी के कारण होने वाली चिंताओं और चुनौतियों पर चर्चा की गई। लॉकडाउन, स्कूल-कॉलेज की बंदी, परिवार में बीमारी, आर्थिक तंगी और वैक्सीन पर हिचकिचाहट पर बात हुई। लव मैटर्स ने उन सवालों की एक सूची भी तैयार की, जो युवा लोगों के मन में महामारी के संबंध में थे। इस पेज पर हम उन चर्चाओं में COVID-19 के बारे में पूछे गए सवालों के जवाब प्रकाशित कर रहे हैं।

कोविड -19 के दीर्घकालिक प्रभाव क्या हैं?

कोविड -19 ज्यादातर लोगों को अलग-अलग तरीकों से प्रभावित करता है। तत्काल प्रभाव से संक्रमित कुछ लोगों में हल्की या कम गंभीर समस्या पैदा होती है और वे बिना अस्पताल में भर्ती हुए ठीक हो जाते हैं, जबकि अन्य लोगों में गंभीर लक्षण मिलते हैं और उन्हें अस्पताल में भर्ती होने की जरुरत हो सकती है। कुछ मामलों में, कोविड -19 का प्रभाव लंबे समय तक बना रह सकता है, खासकर उन लोगों में जिन्हें गंभीर लक्षण थे या जिन्हें अस्पताल में भर्ती होना पड़ा था। इन दीर्घकालिक प्रभावों (संक्रमण से ठीक होने के बाद) में थकान, सांस की तकलीफ, जोड़ों में दर्द, खांसी, शारीरिक और मानसिक गतिविधियों के लिए कम क्षमता शामिल हो सकती है। दुर्लभ मामलों में, इसके कारण फेफड़ों, हृदय या मस्तिष्क जैसे अंगों में दीर्घकालिक समस्याएं पैदा हो सकती हैं। हालांकि, नई बीमारी होने के कारण, इंसानों पर कोविड -19 के प्रभाव पर अभी भी शोध किया जा रहा है। विवरण यहां देखें।

क्या मास्क वाकई असरदार है? यह कितना प्रभावी है?

बिलकुल, अन्य निवारक उपायों, जैसे टीकाकरण, बार-बार हाथ धोने और शारीरिक दूरी के साथ-साथ फेस मास्क कोरोनावायरस को फैलने से रोकने का एक बहुत प्रभावी तरीका है।

सबसे पहले यह समझना जरूरी है कि मास्क कैसे वायरस को फैलने से रोकते हैं। चूंकि कोरोनावायरस रेस्पिरेटरी ड्रॉपलेट से फैलता है जो बात करते, खांसते, छींकते या सांस लेते समय एक व्यक्ति की सांस से दूसरे में जा सकता है। यदि दोनों व्यक्ति मास्क पहने हुए हैं, तो ये रेस्पिरेटरी ड्रॉपलेट एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति में नहीं जा पाएंगे, इस प्रकार वायरस को फैलने से रोका जा सकता है।

मास्क को अधिक प्रभावी बनाने के लिए इसे लगाते समय यह ध्यान रखना चाहिए कि यह आपके चेहरे के किनारों पर अच्छी तरह से फिट रहे जिससे बाहरी हवा सीधे अंदर न आ सके। इसके अलावा मास्क को ऐसे लगाएं कि यह नाक, मुंह और ठुड्डी पर अच्छे से टिका रहे और कहीं कोई गैप ना हो। मास्क के किनारों से हवा नहीं निकलनी चाहिए।

मास्क के ऊपरी हिस्से से हवा को बाहर निकलने से रोकने के लिए आप मोड़ने वाली नोज स्ट्रिप का इस्तेमाल करके मास्क की प्रभावशीलता भी बढ़ा सकते हैं। कुछ लोग दोहरी सुरक्षा के लिए डबल मास्क भी पहनते हैं - यानी कपड़े के मास्क के नीचे एक डिस्पोजेबल मास्क।

मास्क को अधिक प्रभावी बनाने के लिए मास्क का उचित इस्तेमाल, रखरखाव और सफाई भी जरूरी है।

क्या गर्भवती  होने के बारे में सोचने का यह सही समय है?

गर्भावस्था तो बहुत अच्छी परिस्थितियों में भी नए होने वाले पेरेंट्स और उनके परिवारों के लिए काफी चुनौतीपूर्ण समय होता है। कोविड-19 महामारी ने बेशक इन चिंताओं को और बढ़ा दिया है। विभिन्न शोधों में यह बात सामने आयी है कि कोरोनावायरस वास्तव में प्लेसेंटा के जरिए जन्म से पहले मां से भ्रूण में जा सकता है। हालांकि, किसी भी शोधकर्ता के पास उन महिलाओं के रिजल्ट से जुड़े डेटा नहीं है, जिन्हें गर्भावस्था के शुरुआती दिनों में संक्रमण हुआ था।

हालांकि, ऐसे जोखिमों का सामना करने के लिए, भारतीय टीकाकरण कार्यक्रम सफलतापूर्वक चल रहा है और 80 करोड़ से अधिक लोगों का टीकाकरण हो चुका है। बीमारी के अधिक जोखिम को कवर किया गया है और इस समय अगर आप गर्भवती होने के बारे में विचार कर रही हैं तो सभी कोविड प्रोटोकॉल को ध्यान में रखें और डॉक्टर से परामर्श लें।

भारत सरकार ने गर्भवती महिलाओं के लिए कोविड-19 के टीके को भी मंजूरी दे दी है। अधिक जानकारी के लिए  यहां पढ़ें।

छोटे बच्चे जो कहीं बाहर नहीं जाते उनको क्यों कोरोना हो रहा है?

कोविड 19 एक संक्रामक बीमारी (वायरल इंफेक्शन) है। यह एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति में फैलता है। अगर घर में कोई वयस्क (बिना किसी लक्षण के या लक्षण सहित) वायरस से संक्रमित है, तो बच्चे भी संक्रमित हो सकते हैं। यदि वे किसी ऐसी चीज को छूते हैं, जिसकी सतह पर वायरस है, तो इंफेक्शन होने की (बहुत ही) हल्की संभावना होती है - जैसे: ठेले पर से खरीदी गई सब्जियां या संक्रमित कूरियर पैकेज को छूना आदि। हालांकि, ग्लोबल डेटा के अनुसार, बच्चों में यह बीमारी गंभीर नहीं होती है। कोविड-19 वाले अधिकांश बच्चों में लक्षण हल्के होते हैं या कोई लक्षण नहीं होता है।

जब कोरोना से आदमी मर जाता है तो उससे किसी को क्यों नहीं मिलने दिया जाता?

कोरोना वायरस इंफेक्शन एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति में सांस में मौजूद ड्रॉपलेट के जरिए फैलता है जो एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति में बात करने, छींकने, खांसने या उन सतहों को छूने के दौरान फैल सकता है जहां ये ड्रॉपलेट चिपकी होती हैं। यह वायरस संक्रमित व्यक्ति की लार, कफ या खून में भी मौजूद होता है। किसी व्यक्ति की मृत्यु के बाद भी, वायरस उसके शरीर में मौजूद होता है और निकट संपर्क होने पर दूसरे व्यक्ति में फैल सकता है। यही कारण है कि यदि किसी व्यक्ति की मृत्यु कोरोना वायरस इंफेक्शन के कारण हुई है तो शव के पास जाने पर प्रतिबंध है। 

वर्तमान दिशानिर्देशों के अनुसार यहां तक ​​कि अंतिम संस्कार करने वालों को भी विशेष सुरक्षात्मक कपड़े पहनकर अपनी सुरक्षा करनी होती है। रिश्तेदारों को पर्याप्त सुरक्षा के साथ मृत व्यक्ति देखने के लिए अनुमति दी जाती है लेकिन छूने / गले लगाने / चूमने की अनुमति नहीं है। आमतौर पर जब ऐसे सुरक्षात्मक कपड़े उपलब्ध नहीं होते हैं, तो हॉस्पिटल विजिटर्स को शव को देखने की इजाजत नहीं दे सकते हैं। साथ ही, इंफेक्शन के आगे फैलने से रोकने के लिए तुरंत दाह संस्कार को प्राथमिकता दी जाती है।

जब पहली बार लॉकडाउन हुआ था, हमारे देश के डॉक्टर्स और नर्सेस हमारी मदद कर रहे थे, लेकिन इस बार सब लापरवाही क्यों कर रहे हैं?

ऐसी बात नहीं है। अप्रैल-मई के दौरान जब वायरस की दूसरी लहर ने हम पर हमला किया, तब हमारे पास ऑक्सीजन सिलेंडर, इंजेक्शन, हॉस्पिटल के बेड और दवाओं जैसे संसाधनों की कमी थी क्योंकि कोविड -19 से गंभीर रूप से पीड़ित लोगों की संख्या अधिक थी और हमारा हेल्थ सिस्टम इसे नियंत्रित करने के लिए पर्याप्त नहीं था। इसलिए डॉक्टरों और अन्य चिकित्सा कर्मियों पर दबाव बहुत अधिक था। 

उस दबाव में भी उन्होंने मरीजों की मदद के लिए लगातार काम किया। डॉक्टरों के कई दिनों तक घर नहीं जाने और बहुत लंबी शिफ्ट में काम करने की खबरें थीं क्योंकि हेल्थ सिस्टम पर ज़रूरत से ज्यादा दबाव था। जैसे-जैसे मामलों की संख्या घटती गई, हेल्थ सिस्टम भी बेहतर तरीके से निपटने लगा। हम में से अधिकांश लोग बीमारी से केवल कुछ हफ़्ते तक जूझते हैं, जबकि डॉक्टर और अन्य स्वास्थ्य कर्मी डेढ़ साल से इससे निपट रहे हैं। वे भी इंसान हैं, हमारे जैसे उनका भी परिवार है, यह नहीं भूलना चाहिए।

कोरोना से मरने वालों का सही आंकड़ा क्या है?

सटीक संख्या बताना मुश्किल है क्योंकि संख्याएं हर दिन बदल रही हैं। 29 जून 2021 तक भारत में महामारी से होने वाली मौतों की आधिकारिक संख्या 397637 थी, हालांकि कम रिपोर्टिंग के कारण वास्तविक संख्या अधिक हो सकती है।

कुछ देशों में कोरोना को बिलकुल कण्ट्रोल कर लिया गया है, तो इंडिया में कण्ट्रोल नहीं होने का क्या कारण है?

136.64 करोड़ की आबादी के साथ भारत दुनिया का दूसरा सबसे अधिक आबादी वाला देश है। इस विशाल जनसंख्या घनत्व के साथ, जहां कई क्षेत्रों में लोग एक-दूसरे के बहुत करीब रहते हैं, तो कोरोनावायरस जैसी संक्रामक बीमारियों का फैलना आसान है। इसलिए इस महामारी पर काबू पाने में समय लग रहा है। हालांकि, टीकाकरण कोरोनावायरस से लड़ने का एक पॉजिटिव तरीका है। जितने अधिक लोगों का टीकाकरण होगा, कोरोनावायरस का प्रसार उतना ही कम होगा।

क्या कोरोना की तीसरी लहर आने वाली है? और उसका क्या कारण है?

कोई भी यह पुष्टि नहीं कर सकता है कि कोरोना की तीसरी लहर आएगी या नहीं और अगर आएगी तो कब आएगी। तीसरी लहर आएगी या नहीं यह काफी हद तक इस बात पर निर्भर करेगा कि हम कितनी सख्ती से कोविड-19 नियमों का पालन करते हैं, जैसे कि हमेशा सार्वजनिक जगहों पर मास्क पहनना, सार्वजनिक समारोहों में शामिल न होना, सार्वजनिक रूप से दूरी बनाए रखना और नियमित अपने हाथों को धोना और सैनिटाइज करना। इससे नए इंफेक्शन की संख्या को नियंत्रित रखने में मदद मिलेगी। जितनी जल्दी हो सके वैक्सीन लगवाना भी जरूरी है ताकि अधिक से अधिक लोगों का बीमारी से बचाव हो और लोग बीमार न पड़ें या कम से कम हॉस्पिटल में भर्ती होने की आवश्यकता न पड़े। यह सब इस बात पर निर्भर करता है कि हम कोविड -19 से जुड़े नियमों का कितनी अच्छी तरह पालन करते हैं।

कोरोना से इंसान की मृत्यु हॉस्पिटल में ही क्यों होती है, घर में या फिर कहीं बाहर क्यों नहीं होती?

कोविड-19 इंफेक्शन का अलग-अलग लोगों पर अलग-अलग प्रभाव पड़ता है। अधिकांश (80 प्रतिशत आबादी) के लिए यह एक बहुत ही हल्का इंफेक्शन है और लगभग 10-20 लोगों को ही हॉस्पिटल में भर्ती होने की आवश्यकता होती है। इसमें से करीब 3-5 लोगों को गहन देखभाल की जरूरत है। अक्सर अन्य गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं जैसे हाई ब्लड या अस्थमा वाले लोगों के लिए कोविड 19 के लक्षण और बीमारी गंभीर होती है। ऐसे मामलों में, कोरोना वायरस संक्रमण बहुत गंभीर हो जाता है और हॉस्पिटल में भर्ती होने की आवश्यकता होती है।

दूसरे शब्दों में, केवल गंभीर मामलों में ही हॉस्पिटल में भर्ती होने की आवश्यकता होती है। इसके अलावा, आमतौर पर इन्फेक्शन के पहले कुछ दिनों में ( केवल घरेलू इलाज की कोशिश करते हुए) डॉक्टर से परामर्श किए बिना, मरीज बहुत बाद के चरण में अस्पताल पहुंचते हैं। इससे उनके हॉस्पिटल पहुंचने पर स्थिति और गंभीर हो जाती है।

आपके लिए यह समझना ज़रूरी है कि हॉस्पिटल में भर्ती होने के कारण मौतें नहीं हो रही है बल्कि पहले से मौजूद स्वास्थ्य समस्याओं या इलाज में देरी के कारण ऐसा हो रहा है। इसलिए जिस किसी में भी कोरोना वायरस के लक्षण दिखें उसका जल्द से जल्द टेस्ट किया जाए ताकि समय रहते सही इलाज शुरू हो सके।

कोरोना बीमारी के लिए क्या कोई दवाई इस्तेमाल कर सकते हैं, खासकर शुरुवात में?

वर्तमान में कोरोना वायरस इंफेक्शन का कोई इलाज नहीं है। रोग के लक्षणों को कम करने के लिए ही दवाएं उपलब्ध हैं। ज्यादातर मामलों में, ज्यादातर लोग क्रोसिन को छोड़कर किसी विशेष दवा की जरूरत के बिना घर पर ठीक हो जाते हैं। लेकिन डॉक्टर से सलाह लेना सबसे जरूरी है। डॉक्टर आपके लक्षणों को परखकर यह तय करेंगे कि आपको किस दवा की आवश्यकता कितनी मात्रा में और कितने समय तक के लिए है। यह दोहराना बहुत जरूरी है कि डॉक्टर की सलाह के बिना दवाएं नहीं लेनी चाहिए क्योंकि इससे कई जटिलताएं हो सकती हैं जिन्हें बाद में कंट्रोल करना मुश्किल हो सकता है। इसलिए फिर चाहे वो कोरोना वायरस हो या कोई और इंफेक्शन, प्लीज बिना डॉक्टर की सलाह के दवा न लें।

कोरोना की तीसरी लहर में क्या क्या इंतज़ाम किया गया है?

हालांकि तीसरी लहर के बारे में कुछ भी निश्चित नहीं है। सरकार हॉस्पिटल जैसे बुनियादी ढांचे के निर्माण और बीमारी से लड़ने के लिए आवश्यक दवाओं, ऑक्सीजन सिलेंडर और इंजेक्शन आदि के पर्याप्त स्टॉक जुटाने पर फोकस करके स्थिति के लिए कमर कस रही है।

सरकार सामान्य रूप से व्यक्तियों और विशेष रूप से बच्चों के संक्रमित होने की संभावना का अनुमान लगाने के लिए काम कर रही है। सभी को टीका लगवाने के लिए भी वह हर संभव कोशिश कर रही है। जितने अधिक लोगों को टीका लगाया जाएगा, भविष्य में वायरस के किसी भी खतरे का प्रभाव उतना ही कम होगा।

कोविड -19 की टेस्टिंग क्षमता भी लगभग 40,000 प्रति दिन से बढ़ाकर 18 जून तक एक लाख कर दी गई है। सरकार अब मोबाइल लैब स्थापित करने और घर पर सेल्फ टेस्टिंग की अनुमति देने के अलावा नई आरटी-पीसीआर लैब स्थापित करने की व्यवस्था कर रही है। इससे टेस्टिंग क्षमता बढ़ेगी और सरकार को कम समय में अधिक पॉजिटिव मामलों का टेस्ट करने और ट्रैक करने में मदद मिलेगी। सरकार ने देश भर के कई अस्पतालों में स्थायी ऑक्सीजन प्लांट भी स्थापित किए हैं और निजी ऑक्सीजन उत्पादन को प्रोत्साहित करने के लिए विभिन्न नीतियां भी पेश की हैं। कोविड-19 के खिलाफ लड़ाई का एक बड़ा हिस्सा जनता पर भी निर्भर करता है जिन्हें जल्द से जल्द टीका लगाने की कोशिश करने और टीकाकरण के बाद भी कोविड-उपयुक्त व्यवहार का पालन करने की आवश्यकता है।

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