violence against women
Shutterstock/Asia Images Group/फोटो में मॉडल् हैं। 

‘मेरी बेटी को हाथ भी मत लगाना’

द्वारा Imran Khan दिसंबर 2, 01:12 बजे
डॉ शीला रंजन* यूनिवर्सिटी में इकोनॉमिक्स की प्रोफेसर हैं। लेकिन आज भी उनको अपनी ज़िन्दगी एक सपना सी ही लगती हैं। अगर उनकी माँ ने बचपन में अपने और उनके लिए लड़ाई न लड़ी होती तो शायद वो आज जीवित भी नहीं होती। लव मैटर्स के कैंपेन #ItsTimeToAct के लिए डॉ शीला ने अपनी कहानी लव मैटर्स से शेयर की।

आज भी सब यूँ ही 

आज मैं 30 बरस की हो गयी हूँ। इन 30 सालों में बहुत कुछ बदला हैं। मेरी जिंदगी में भी और समाज में औरतों के लिए भी। पर आज भी अखबार में रोज़ एक न एक खबर तो मिल ही जाती हैं। पति ने पत्नी को मारा। बहू को जला कर मार दिया । बेटी को जात के बाहर शादी करने के लिए मार दिया। और ऐसी अनगनित महिलाओं पर हिंसा की वारदातें। जहां महिलाएं कुछ नहीं कर पाती - बस खुद को बेबस और असहाय पाती हैं। 

और फिर मैं सोच में पड़ जाती हूँ। आखिर मेरी माँ ने उतने साल पहले वो सब कैसे किया? कहाँ से इतनी हिम्मत जुटाई? कैसे लड़ी उन्होंने अपने लिए और मेरे लिए वो लड़ाई। 

आज भी वो सब बातें मुझे ऐसे याद हैं, जैसे बस कल की ही हो। माँ अपना दुःख बस मुझ से कह पाती थी। कितने ही बार अपना मन हल्का करने के लिए मुझे वह सब बातें बताती...कुछ मेरे पैदा होने से पहले की। इतने साल में ऐसा लगता है मानो मैं हर पल माँ के एक दुःख में उनके साथ थी।  

मिर्च मसाला

पापा को अकसर सिल बट्टे पर पिसी लाल मिर्च की चटनी खाने का नशा चढ़ता था। उस दिन भी पापा ने लहसुन और मिर्ची की चटनी पीसने को कहा।

इतने बीच में दादी ने आवाज़ दी, ‘लेया पाणी, चटनी बाद में पीस लीजो’

‘ला रही अभी हाथ धो लूँ, वरना मिर्च मुँह पर जलने लगेगी।’

बस दादी बिगड़ गयी। दादी अक्सर पापा से मां के लिए झूठी शिकायत लगाती थी। आज उन्हें फिर मौका मिल गया था। ‘देख ले, तेरी बींदणी से तो पाणी भी न मिल सके।’ बस पापा ने आंव देखा न तांव, जड़ दिया मम्मी को एक तमाचा।  

मां तो वैसे अनगिनत बार पापा से पिट चुकी थी। एक बार तो पापा ने मम्मी के मुंह पर गुस्से में लाल मिर्च की चटनी मल दी थी। मम्मी का पूरा मुँह जलने लगा था। मगर मम्मी पता नहीं क्यों कुछ भी नहीं कहती थीं। शायद उन्होंने बस आदत पड़ गयी थी।

इन सब के बाद माँ कभी भी दुखी हो कर नहीं बैठती थी। झट से बिल्कुल नार्मल हो जाती थी।

बस एक छोरा 

दादी अक्सर पापा को माँ को तलाक देने के लिए उकसाती। पापा बस यही कहते रहते, ‘अम्मा खाना खाण दे, गर्भवती है वो, टाबर जन्मने वाली है, क्या पता छोरा हो जाए, इसकी  माँ के भी पहला छोरा और इसकी दोनो बहनों का भी पहला छोरा। इसके भी छोरा ही होगा।’

ये उन दिनों की बात है जब मैं अपनी माँ के पेट में थी। एक छोरे की चाह के बावजूद पापा मम्मी पर हाथ उठाने से नहीं चूकते थे।  

जब डिलीवरी की बारी आयी तो माँ ने दादी से हॉस्पिटल के जाने के लिए कहा। उन्होंने मम्मी की एक भी नहीं सुनी और डाँटने लगी।

‘अरी बड़ी रानी मल्लिका न बन, हमने भी बच्चे जने हैं, हमें कोई ज़रूरत नहीं पड़ी अस्पताल की।’

7 घण्टे तक दर्द झेल कर मां ने मुझे जन्म दिया। दादी और पापा को यह बात बहुत नागवार गुज़री। उन्होंने सिर पीटना शुरू कर दिया। लड़की होना उस वक़्त भी बुरा माना जाता था और आज भी। 

जब मैं हुई तो पापा ने बवाल कर दिया था। 

कुछ दिन तो गुस्से में रहे। फिर एक दिन दादी को आकर बोला, ‘इस से एक छोरा भी पैदा नहीं हुआ। अम्मा यह लड़की किसी को दे दे, या मैं इसको तलाक दे देता हूँ, मैं न चेहरा देखूं दोनों माँ बेटी का।’

फिर सीधे माँ के पास आए और बोले:

‘देख पायल, मैंने हमेशा छोरे की ख्वाहिश रखी तेरे से, अब या तो तू इस बच्ची को किसी को दे दे, या मैं तुझे छोड़ रहा हूँ, देख ले तुझे क्या करना है।’

उस दिन पता नहीं कहाँ से मम्मी को हिम्मत आयी।

‘9 महीने तूने नहीं, मैंने रखा है इसको अपनी कोख़ में, तू जा कर डूब मर, या छलांग लगा ले छत से, मैं न तो बच्ची दूँगी और न इस घर से निकलूंगी’, मम्मी ने पापा से आवाज़ ऊँची कर के बोला। 

इतना बोलने भर से मम्मी के बालों को खींचते हुए पापा आँगन में ले आये। मम्मी के हाथ में मैं भी थी, पापा को मेरा कोई ख़्याल नहीं था। इसी छीना झपटी में मैं मम्मी के हाथ से छूट कर गिर गयी और मेरे सिर में चोट लग गयी। मम्मी से ये सब बिल्कुल भी नहीं देखा गया। 

छूना भी मत 

उन्होंने पापा को धक्का देते हुए कहा, ‘आज तो तेरे को धक्का दिया है, कल तेरे हाथ भी काट सकती हूँ, अगर तूने मेरी बेटी को कुछ भी कहा। तेरी आँखे नोच लूँगी। मुझे तू जितना हो सके उतना मार, डांगर की तरह मार, मगर ध्यान रखियो मेरी बेटी को छू मत लियो।’

इस बात से गुस्सा होकर पापा ने मुझे और मम्मी को घर से निकाल दिया। यह सब देख कर मम्मी टूट चुकी थी। हाँ, मगर कमज़ोर नहीं पड़ी। रात 2:30 बजे मां सीधी सरपंच के पास पहुँची। मम्मी ने पूरी आपबीती सरपंच जी को सुना दी। पूरी रात सरपंच जी कि बीवी ने मुझे और मम्मी को सम्भाले रखा। 

बात लम्बी खींची और सरपंच का फैसला हुआ। सरपंच जी ने पापा को धमकाया।

‘देख सुनील, अगर तूने अबकी बार बच्ची को या पायल को मारा या इसको तलाक़ देने कि बात की तो ध्यान रखियो यह ग़ैरकानूनी है, और अगर बात कलेक्टर साहब के पास पहुंच गई तो समझ पूरे शहर में फ़ैल गई तो तू और तेरी माँ सीधा जेल जाएगी।’

इस बात से पापा घबरा गए और अपने साथ मम्मी और मुझे साथ घर ले गए। साल बीतते गए और मैं सब समझने लगी और मैं स्कूल जाने के लायक हो गई। पापा ने क्लियर कह दिया था मम्मी से कि यह स्कूल नहीं जाएगी।यहीं से मम्मी और मेरी ज़िन्दगी नए मोड़ पर आकर खड़ी हो गयी और यही से मेरी विद्रोही मम्मी का विद्रोह शुरू हुआ। 

मेरी पूरी ज़िम्मेदारी अब बस मम्मी के हाथों में थी। स्कूल में नाम लिखवाया गया। सरपंच की पत्नी बहुत अच्छे स्वभाव की थी उन्होंने मम्मी को बहुत प्रेरित किया। 

पापा और दादी मुझे और मम्मी को ठीक से खाना भी नहीं देते थे। मम्मी को एक आध रोटी और आधी कटोरी दाल मिलती थी, जो वो मुझे पानी के साथ मिला कर खिला देती थीं। 

सूई धागे से बुने सपने

धीरे धीरे मम्मी ने सिलाई का काम शुरू किया।  मैं मम्मी से जब भी कुछ खरीदने को बोलती, तो मम्मी बोलतीं, "सूई धागा है न। बस कुछ दिन और, फिर तू जो बोलेगी, ला दूँगी तेरे लिए।"

धीरे धीरे मम्मी साड़ी में फॉल लगाने और ब्लाउज सिलने में माहिर हो चुकीं थीं। उन्हें और काम मिलने लगा। मैं भी बहुत मेहनत से पढ़ती थी। माँ के ज़ख़्मों को देख कर और जुनून सवार कर लेती थी। 

पापा ने हम दोनों को बिल्कुल नकार दिया था। मैंने उनको कभी भी मम्मी से बात करते हुए नहीं सुना। हाँ! बस उनकी पिटाई और डांट ज़रूर देखी थी।

एक रात की बात है जब मैं शायद ग्यारहवीं या बारहवीं में थी। पापा मेरे और मम्मी के होते हुए दूसरी शादी कर ले आए। यह सब देख कर मम्मी का बहुत बुरा हाल हुआ। इसी दिन मम्मी के हाथ में मशीन की सूई घुस गई थी। जिससे उनको ज़ख्म हो गया था।

उस दिन पापा ने मम्मी से कहा, ‘ले तेरी आज़ादी के काग़ज़’। वो डिवोर्स के पेपर थे। मुझे तलाक़ शब्द तभी समझ आया। पापा ने मम्मी को तलाक दे दिया और हम दोनों को एक महीने का समय दिया घर से निकलने का। 

रास्ता बहुत कठिन था। मगर मम्मी का ‘सुई धागा’ साथ था। सच कहूं तो उस सुई धागे ने हमारे सपनों साकार किया था। मैंने बारहवीं कक्षा 98% से पास की। 

उसके बाद इग्नू से डिस्टेंस कोर्स कर ग्रेजुएशन किया। इसी दौरान मैं एक प्राइमरी स्कूल में टीचिंग करने लगी। 1800/- रुपये मेरी पहली सैलरी थी। इसके बाद ग्रेजुएशन के बाद हालात अच्छे नहीं थे। मम्मी को टीबी हो गई थी। 

मैंने शाम को 6 से 10 तक एक कोचिंग में इकॉनोमिक्स पढ़ाना शुरू किया। फिर ज़िंदगी आगे बढ़ती गई। माँ आज बिल्कुल ठीक हैं। मैं इकॉनोमिक्स की प्रोफ़ेसर हूँ। मेरी सैलेरी 85 हज़ार है। मगर मम्मी की मशीन और सूई धागा आज भी हमारे साथ है। 

अखबारों में खबरें पढ़कर अक्सर सोचती हूँ, काश इन सब औरतों में भी मेरी माँ जैसी हिम्मत आ जाये और पायल जैसे जीत लें अपनी ज़िंदगी। ज़िन्दगी में ज़रूरी नहीं किसी पुरुष का साथ हो। ज़रूरी है तो बस हिम्मत और जज़्बात।

डॉ शीला रंजन* ने ये कहानी लव मैटर्स इंडिया के साथ #It’sTimeToAct कैंपेन के अंतर्गत साझा की। इस कैंपेन का मकसद हिंसा या उत्पीड़न के खिलाफ महिलाओं द्वारा लड़ी गयी लड़ाइयों की कहानियों को सामने लाना है।

गोपनीयता का ध्यान रखते हुए नाम बदल दिए गए हैं और फोटो में मॉडल् हैं।  

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