abortion in india
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लोक सभा ने पारित किया भारत का नया एबॉर्शन कानून

भारत में गर्भ समापन 1971 से ही कानूनी रूप से मान्य है, लेकिन इसके साथ कई तरह की शर्तें भी जुड़ी हुई हैं꠰ इस कानून में बदलाव किया जाने वाला है꠰ आइये देखते हैं कि ये होने वाले बदलाव क्या हैं?

एम टी पी अमेंडमेंट 2020

भारत में गर्भ-समापन कानून पर विचार-व्यवहार ‘मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ़ प्रेगनेंसी कानून (MTP - 1971) के अंतर्गत होता है꠰ 1971 में बने इस कानून के मुताबिक, गर्भ ‘निरोध’ के काम ना करने की अवस्था में गर्भ समापन विवाहित महिलाओं के लिए क़ानूनी रूप से मान्य था꠰ MTP अमेंडमेंट 2020 बिल यह प्रावधान अविवाहित महिलाओ को भी देता है꠰

नया बिल में ज़रूरी परिस्थितियों में, ज़रूरी डॉक्टरी जाँच परख के बाद, गर्भ समापन की अवधि बीस हफ़्ते के गर्भ से बढ़ाकर चौबीस हफ़्ता की गयी है꠰ इन परिस्थितियों में बलात्कार से ठहरे गर्भ, इन्सेस्ट रिश्ते से ठहरे गर्भ, शारीरिक रूप से अक्षम गर्भधारक, नाबालिग, और असामान्य भ्रूण को शामिल किया गया है꠰

इस नये बिल में यह बात भी शामिल की गयी है कि अगर बीस हफ़्ते से कम में भी गर्भ समापन करवाना है तो एक डॉक्टर की सलाह आवश्यक है꠰ बीस से चौबीस हफ़्तों के बीच गर्भ समापन के लिए एक सरकारी मेडिकल पैनल निर्णय लेगा꠰ 

नया बिल स्त्रियों को अधिक गोपनीयता प्रदान करता है꠰ कोई भी महिला जिसका गर्भ-समापन किया जाने वाला है, उसके नाम एवं अन्य जानकारियों को कानून के द्वारा अधिकृत लोगों के अतिरिक्त किसी से भी साझा नहीं किया जाएगा꠰ अधिकृत व्यक्तियों के अतिरिक्त, किसी और के द्वारा  इस तरह की निजी जानकारियों को सार्वजनिक करने पर दोषी को एक साथ की क़ानूनी सज़ा, जुर्माना अथवा दोनों का भागी बनना पड़ेगा꠰

आगे क्या?

यह बिल संसद के निम्न सदन -  लोक सभा में 17 मार्च 2020 को पारित हो गया है और अब इसे उच्च सदन अर्थात राज्यसभा में रखा जायेगा꠰ उच्च सदन द्वारा पारित कर दिये जाने के बाद इसे राष्ट्रपति के सम्मुख प्रस्तुत किया जाएगा꠰ राष्ट्रपति के द्वारा हस्ताक्षर करते ही यह बिल कानून के रूप में स्वीकृत हो जायेगा꠰

जहाँ इस बिल को प्रगतिशील एवं सुरक्षित गर्भ-समापन की राह से बाधा हटाने वाला माना जा रहा है, वही कुछ चिंताएँ भी हैं꠰

चिंताएँ

सुरक्षित एवं कानूनी गर्भ-समापन का अधिकार अभी भी स्त्रियों के पास पूरी तरह से उपलब्ध नहीं है क्यूंकि नया क़ानून महिलाओ को अपने शरीर से जुड़े निर्णय लेने की पूरी आज़ादी नहीं देता꠰ 

नए कानून के मुताबिक़ भी, स्त्रियों को  गर्भ-समापन के अधिकार की सुविधा एक मुक्त जनन अधिकार की तरह मिलने की जगह, कुछ चिकित्सकीय और सामजिक शर्तों के अनुरूप ही मिल रही है꠰  बिल के अनुसार गर्भ-समापन के लिए किसी डॉक्टर की सलाह ज़रूरी है꠰ इसका मतलब यह है कि अपने शरीर के बारे में पूर्ण निर्णय का हक स्त्रियों के पास मौज़ूद नहीं꠰

अगली बात यह कि संभावित गर्भ-समापन कानून, गर्भ के  कानूनी समापन की अवधि को बढ़ा कर बीस से चौबीस हफ़्ते कर रहा है, लेकिन यह वृद्धि केवल कुछ ख़ास परिस्थितियों मसलन बलात्कार पीडिता, इन्सेस्ट पीड़िता, अथवा नाबालिग के लिए ही सीमित है꠰ यह हिस्सा इस बात को रेखांकित करता है कि जो स्त्रियाँ इन श्रेणियों में नहीं आती हैं वे बीस हफ़्ते के बाद गर्भ-समापन नहीं करवा पायेंगी, चाहे उनके पास कोई बहुत लाज़िम वजह (जैसे कि वे गंभीर रूप से घायल हैं, और गर्भ-समापन करवाना चाहती हों) भी क्यों न हो꠰  

और भ्रूण के असामान्य होने की वजह से होने से बीस हफ़्ते से अधिक में होने वाले गर्भ-समापन में एक मेडिकल बोर्ड के विचार की ज़रूरत होगी, जिसका सीधा अर्थ है कि निर्णय लेने का हक़ यहाँ एक महिला और उसके डॉक्टर के पास से उठकर, मेडिकल बोर्ड के रूप में किसी तीसरे के पास जा रहा है꠰

जहाँ यह नया बिल स्त्रियों को निजता और गोपनीयता देने की बात करता है, वहां कानून द्वारा अधिकृत व्यक्ति के साथ जानकारी साझा करने की बात भी करता है꠰ उदाहरण के लिए, एम टी पी एक्ट डॉक्टर्स के लिए यह आवश्यक कर देता है कि वे गर्भ-समापन की इच्छा रखने वाली स्त्रियों की जानकारियाँ एकदम गुप्त रखें, पर यह दफ़ा ‘प्रोटेक्शन ऑफ़ चिल्ड्रेन फ्रॉम सेक्सुअल ऑफेंस (पोक्सो) एक्ट के साथ अंतर्विरोध में है꠰ पोक्सो के अनुसार नाबालिग के साथ हुए किसी भी तरह की यौनिक क्रिया की रपट पुलिस में लिखवाना आवश्यक है꠰ इसके मुताबिक़ किशोर लड़कियां जो भिन्न कारणों से गर्भ-समापन करवाना चाहेंगी, उन्हें बेहद मुश्किल होगी꠰ दफ़ाओं का आपसी अंतर्विरोध  स्वास्थ्य सेवियों के लिए भी किशोर लोगों को सेक्शुअल हेल्थ काउन्सलिंग या उससे जुड़ी मेडिकल सेवाएं देने में समस्याएँ पैदा कर सकता हैं꠰

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