violence against woman
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जी हाँ, हम सभी महिलाओं के ख़िलाफ़ हिंसा को बढ़ावा देते हैं : आइये बताएं कि कैसे आप इसे रोक सकते हैं

द्वारा Srushti Mahamuni नवंबर 20, 12:04 बजे
हर तीन में से एक महिला ने अपने जीवनकाल में हिंसा का अनुभव किया हैI जब हम महिलाओं के विरूद्ध हिंसा के बारे में सोचते हैं, तो अकसर हम अजनबियों द्वारा महिलाओं का बलात्कार किया जाना या उनके ससुराल वालों द्वारा उन्हें जला दिए जाने को ही हिंसात्मक व्यवहार का दर्जा देते हैंI हालांकि यह सच है, लेकिन हिंसा रोज़ होने वाली कुछ 'सामान्य' परिस्तिथियों में भी हो सकती है, जिसे हम अकसर अनदेखा कर देते हैं, क्यूंकि शायद वो हमें महत्त्वहीन लगती हैI लेकिन ऐसा नहीं हैI हमारे ऐसा करने से अनजाने में हम एक ऐसी सभ्यता बनाने में योगदान दे रहे हैं जिसमें महिलाओं के विरूद्ध हिंसा बढ़ती जा रही है और इसलिए हम सभी की ज़िम्मेदारी बनती है कि इसे बदलने में भी अपनी भूमिका निभाएंI इस हिंसा की संस्कृति को खत्म करने के लिए हम ऐसे शुरआत कर सकते हैंI
यह निजी मामला नहीं है

अकसर हम हमारे आसपास होने वाली हिंसा की घटनाओं को देखते हैं, सड़क पर छेड़छाड़ से लेकर हमारे घरों में महिलाओं के साथ हो रही शारीरिक हिंसा तकI लेकिन हम इसे 'किसी और का निजी मामला' बोल कर अनदेखा कर देते हैंI हिंसा एक 'निजी मामला' नहीं है, भले ही वो किसी भी रिश्ते में या कहीं भी हो रही होI

अगली बार मूक-बधिर होकर सिर्फ़ तमाशाना देखेंI हिंसा के ख़िलाफ़ अपनी आवाज़ उठाएं और अपने दोस्तों / परिवार के सदस्यों को बताएं कि अपनी पत्नी के ऊपर हाथ उठाना सरासर गलत हैI जब भी आप अपने पड़ोस से किसी को चिल्लाते हुए सुनें तो उनके दरवाज़े की घंटी बजाकर ज़रूर पूछें कि क्या सबकुछ ठीक है। जब भी किसी महिला को सड़क पर परेशान होते हुए देखें तब हस्तक्षेप ज़रूर करेंI जब भी आवश्यक हो पुलिस को तुरत कॉल करेंI आपके द्वारा लिया गया एक छोटा सा कदम और आपके द्वारा की गयी एक छोटी सी पहल से उस महिला को महसूस होगा कि वो अकेली नहीं है और अपने ख़िलाफ़ हिंसा से निपटने के लिए उसे हिम्मत मिलेगीI

यह मज़ाक की बात नहीं है

पत्नी: “आपने पिछले साल सालगिरह पर मुझे लोहे का बेड दिया था, इस बार आपका क्या इरादा है?”

पति: “इस साल उस में करंट छोड़ने का इरादा है.”

क्या आपको ऊपर लिखी बात मज़ाक लगी? इस तरह के चुटकुलों की वजह से ही महिलाओं के विरुद्ध हिंसा ना सिर्फ़ सामान्यीकृत होती है बल्कि उसे बढ़ावा भी मिलता हैI यह कहना बिलकुल अतिश्योक्ति नहीं होगा कि 'वे व्हाट्सएप ग्रुप जिनमे केवल पुरुष ही होते हैं, उनमे ऐसे चुटकुलें और बातों का मज़ाक बनाना बेहद सामान्य है'I जब हम 'आंटी आऊं क्या' जैसे संगीत वीडियो को सोशल मीडिया पर साझा करते हैं, जब एक फिल्म का हीरो फिल्मों में अभिनेत्री का पीछा करता है और इसे प्यार के रूप में चित्रित किया जाता है, जब सीमेंट बेचने वाले विज्ञापनों में भी महिलाओं को बिकनी में दिखाया जाता है, जब किसी पब में सर्वश्रेष्ठ नितम्बो के लिए पुरुस्कृत किया जाता है तो हम अनजाने में महिलाओं के ख़िलाफ़ हिंसा को बढ़ावा दे रहे हैंI इस स्थिति की विडंबना यह है कि हम इस सबको को यह कहकर नज़रअंदाज़ कर देते हैं कि अब 'लड़के तो लड़को जैसी ही बातें करेंगे' या 'यह सिर्फ एक मजाक' है।

यह दृष्टिकोण ना केवल महिलाओं, बल्कि पूरे समाज के लिए भी हानिकारक है। जो किसी के लिए मजाक है, वो बहुत से अन्य लोगों के लिए वास्तविकता हो सकती है। इसके बारे में मज़ाक करके, हम ऐसे व्यवहार को सामान्य कर रहे हैं। अगली बार, पत्नी को मारने के बारे में एक मजाक या अपने 'केवल लड़को वाले व्हाट्सप्प ग्रुप' में कोई अश्लील संदेश भेजने से दोबारा ज़रूर सोचियेगाI उस गीत के गीतों को सुनें जो उत्पीड़न को प्रोत्साहित करता है और खुद से पूछें कि अगर यह गीत आपकी बहन, प्रेमिका, पत्नी या मां के बारे में हो तो भी क्या आपको उतना ही अच्छा लगेगा? अगर ऐसा व्यवहार आपके साथ किया जाएगा तो क्या आपको कोई फ़र्क़ नहीं पड़ेगा?

ना का मतलब ना

सहमति होना बेहद महत्वपूर्ण हैI दोनों साथियो की सहमति एक स्वस्थ रिश्ते की बुनियादी आवश्यकता है; बॉलीवुड के गाने कुछ भी कहें, ना का मतलब केवल ना है, इसका मतलब 'हाँ' नहीं है और ना ही इसका मतलब है कि 'तब तक कोशिश करते रहो जब तक लड़की हाँ ना कर देI'उनके मना कर देने के बावजूद लड़कियों का पीछा करना, उन्हें बार-बार फ़ोन या सन्देश भेज कर परेशान करना गलत हैI यहाँ तक ​​कि अगर आपकी प्रेमिका या पत्नी भी अगर सेक्स नहीं करना चाहती तो भी उन्हें ना कहने का अधिकार हैI

किसी के लिए भी, किसी भी परिस्थिति में किसी के साथ हमेशा सेक्स करना अनिवार्य नहीं है, सहमति हमेशा एक शर्त है। अपने दोस्त/दोस्तों को गर्व से यह बताना कि - आपने अपनी गर्लफ्रेंड को ज़बरदस्ती किस किया या उसके साथ ज़बरदस्ती सेक्स किया या उसके पहले मना करने के बाद 'उसे मना/बहला-फ़ुसला' कर सेक्स किया- में कोई भी मर्दानगी नहीं हैI

जी हाँ, हम सभी यह करते है

जानबूझकर या अनजाने में हम अकसर ऐसा करते हैं या कहते हैं जिसे लैंगिकवादी कहा जा सकता हैI हमारे द्वारा उपयोग किए जाने वाले रोज़ाना के वाक्यांशों में से कुछ अकसर महिलाओं के प्रति भेदभावपूर्ण होते हैंI बचपन में सुनी लोकप्रिय कहानियों ने भी कुछ रूढ़िवादी मानसिकताओं को स्थापित किया है जैसे - संकट की घड़ी में फंसी युवती को बचाने के लिए सफ़ेद घोड़े पर बैठ कर एक राजकुमार का आना (मतलब लडकियां कमज़ोर हैं और अकेले अपनी रक्षा नहीं कर सकती), लड़कियों को गुलाबी और नरम चीज़ें पसंद होती हैं (लडकियां कोमल हैं), लड़कियों को खाना बनाना आना चाहिए (इसलिए नहीं कि वो अपना पेट भर सकें, बल्कि इसलिए क्योंकि उन्हें परिवार का पेट भरना है), लड़कियों को ढंग के कपड़े पहनने चाहिए (जिससे पुरुष उन्हें देखकर 'उत्तेजित' ना हों)I

इन्ही धारणाओं की वजह से महिलाओं के ख़िलाफ़ हिंसा को बढ़ावा मिलता है - आप महिलाओं को मारने से हिचकते नहीं हैं क्योंकि वे नरम हैं, महिलाओं को घर चलाना है इसलिए उन्हें बाहर जाने की आवश्यकता नहीं है, एक छोटी पोशाक पहनी हुई महिला बलात्कार को आमंत्रित कर रही है, वगैरह वगैरहI ऐसे हिंसापूर्ण और नियंत्रणपूर्ण व्यवहारों का उन्मूलन करने के लिए ज़रूरी है कि हम इन धारणाओं को बढ़ावा देना बंद करदेंI

अधिकतर देखा गया है कि महिलाएं पुरुष-प्रधान विचारों को प्राथमिकता देती हैंI उन्हें भी स्वयं की धारणाओं और व्यवहार पर सवाल उठाने की ज़रूरत है। हर बार जब भी कोई महिला दूसरी महिला को इस बात के लिए नीचा दिखाने की कोशिश करती है कि - वो छोटे कपड़े क्यों पहनती है, वो लड़को से क्यों बता करती है, वो इतनी रात बाहर घूमने क्यों जाती है, तो वो उन लैंगिक धारणाओं को मज़बूत कर रही है जो महिलाओं के विरूद्ध हिंसा के कृत्यों को जन्म देती हैं। सुनने में यह बात कड़वी लगती है लेकिन है ऐसा हीI

यह पुरुषों का भी मामला है

लिंग समानता महिलाओं का पुरुषों की तरह बनने के बारे में नहीं है, यह पुरुषों और महिलाओं के लिए हमारे समाज को एक बेहतर स्थान बनाने के बारे में है। एक ऐसी दुनिया जहां हर कोई अपनी ज़िंदगी अपने पूरे सामर्थ्य के साथ में जी सकता है; जहां पुरुषों और महिलाओं को उनके शरीर, काम जीवन के बारे में स्वाधीन होकर फैसले लेने का अधिकार हैI हिंसा के बारे में की जाने वाली चर्चाओं में एक समस्या यह है कि इसमें पुरुषों और महिलाओं को किरदार दे दिए जाते हैं और उन्हें दो श्रेणियों में डाल दिया जाता है - 'पुरुषों को अपराधियों की' और 'महिलाओं को पीड़ितों की'I

इन श्रेणियों की बदौलत पुरुषों को केवल समस्या के एक हिस्से के रूप में देखा जाता है और हिंसा को केवल एक महिला का मुद्दा समझ लिया जाता हैI 'पुरुष प्रधान' संस्कृति भी पुरुषों और लड़कों के लिए हानिकारक है, यह मर्दानगी के आदर्शों को अवास्तविक बना देती है और इसका मतलब है कि 'एक आदमी बनने के लिए' पुरुषों पर दबाव बढ़ता जाता है और कई बार अनजाने में इसी दबाव के परिणामवश हिंसात्मक कृत्यों का जन्म होता हैI

चुप्पी तोड़ें- अपनी कहानी हमसे साझा करें

यदि आपने अपने जीवन में हिंसा का अनुभव किया है तो जान लें कि आप अकेले नहीं हैंI महिलाओं के खिलाफ हिंसा ना सिर्फ़ एक व्यक्तिगत आघात है बल्कि यह एक राजनीतिक मुद्दा भी हैI निजी कहानी साझा करने से इस राजनीतिक मुद्दे को लोगों के जीवन से जुड़ने में मदद मिलती है और वर्तमान और भविष्य में उन लोगों को सहायता मिलेगी जिनके साथ हिंसा का कटु अनुभव होI

हिंसा के ख़िलाफ़ चुप रहने से इसे बढ़ावा ही मिलेगाI अधिकांश अपराधियों ऐसा सिर्फ़ इसलिए करते हैं क्यूंकि उन्हें लगता है कि पीड़ित कभी किसी को कुछ नहीं कहेगा और उनका बाल भी बांका नहीं होगाI इस तरह की मानसिकता बदलने की ज़रूरत हैI प रहेगा। इन कहानियों को लोगों तक पहुंचाने के लिए बड़ी हिम्मत चाहिएI अगर आपको लगता है कि आप किसी दोस्त या अपने परिवार के किसी सदस्य की इसमें मदद नहीं ले सकते तो उन संगठनों से संपर्क करें जो आपकी कहानी को लोगों तक पहुँचाने में आपकी मदद कर सकेंI लेकिन यह फैसला लेना कि अपनी कहानी को लोगों तक पहुँचाना है या नहीं, यह तो पीड़ित को ही लेना होगा और यह आसान नहीं होगाI लेकिन ऐसी स्थिति में वो व्यक्ति पीड़ित की मदद कर सकते हैं जो खुद हिंसा से गुज़र चुके हैंI

लव मैटर इंडिया अपने सभी पाठकों से निवेदन करता है कि वे सभी प्रकार के अपमानजनक व्यवहार के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाएंI 25 नवम्बर को महिलाओं के विरूद्ध हिंसा के उन्मूलन के लिए अंतर्राष्ट्रीय दिवस मनाया जा रहा हैI आप भी हमारे फेसबुक पेज पर हमारे साथ मिलकर अपनी आवाज उठाएंI यदि आपके पास कोई विशिष्ट प्रश्न है, तो कृपया हमारे चर्चा मंच पर जाएंI

क्या आप इस जानकारी को उपयोगी पाते हैं?

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