Court Marriage in India procedure
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भारत में कोर्ट मैरिज – सब कुछ जो आप जानना चाहते थे

साना और समीर कोर्ट मैरिज करना चाहते हैं लेकिन कैसे करें? ये पता नहीं था। इस बारे में किससे सलाह लें? और इस प्रक्रिया में किन-किन डाक्यूमेंट्स की जरूरत होगी? दोनों ऐसे प्रश्नों से घिरे थे! क्या आप भी ऐसे सवालों से जूझ रहे हैं? तो अब यह लेख आपकी मदद करेगा।

कोर्ट मैरिज का मतलब भारत के कानून द्वारा दो विपरीत लिंग के बालिगों (पुरुष और महिला) का अदालत में विवाह है (जिसे एक पंजीकृत विवाह के रूप में भी जाना जाता है)। ये विवाह कानूनी होता है इसलिए इसमें दोनों बालिग किसी भी धार्मिक या सांस्कृतिक नियम का पालन करने के लिए मजबूर नहीं होते हैं

अदालती शादी की  प्रक्रिया, उससे जुड़ी पेचीदगियां और जानकारी की कमी अक्सर अड़चन पैदा करती हैं। ऊपर से मित्रों और परिवार द्वारा दी गई आधी-अधूरी और अधकचरी ऑनलाइन जानकारियां भी भ्रामकता पैदा करती है। 

विवाह बंधन में बंधने के इच्छुक लोगों की मदद करने के लिए हमने भारत के सर्वोच्च न्यायालय के  वकील सिद्धार्थ मिश्रा से बात की। 

भारतीय कानून के अनुसार कोर्ट मैरिज क्या है?

कोर्ट मैरिज, स्पेशल मैरिज एक्ट, 1954 के अंतर्गत आता है और यह पूरे देश में लागू है। यह दो बालिगों (समान या अलग-अलग राष्ट्रीयता वाले) को जाति, धर्म या नस्ल से परे, क़ानूनी सहमति से शादी करने का हक देता है।

सीधे शब्दों में कहें, तो कोर्ट मैरिज का मतलब कानून के मुताबिक शादी करना है। प्रक्रिया को पूरा करने के लिए, इच्छुक पक्ष विवाह प्रमाणपत्र प्राप्त करने के लिए सीधे विवाह पंजीयक (रजिस्ट्रार) के पास आवेदन कर सकते हैं।

कोर्ट मैरिज की कार्यवाही शुरू करने के लिए आपको किन दस्तावेजों की आवश्यकता होगी?

दोनों भागीदारों को कोर्ट मैरिज के लिए निम्नलिखित दस्तावेज जमा करने होंगे:

) दोनों बालिगों द्वारा विधिवत हस्ताक्षरित एक आवेदन पत्र

) जन्म प्रमाण पत्र |

) बालिगों का आवासीय प्रमाण पत्र|

) दोनों के दो पासपोर्ट आकार के फोटो|

) दायर आवेदन के लिए रजिस्ट्रार कार्यालय में भुगतान की गई फीस की रसीद|

) यदि दोनों में से कोई भी शादीशुदा था, तो अपने पूर्व साथी का मृत्यु प्रमाण पत्र या तलाक का आदेश |

) दोनों भागीदारों द्वारा एक शादी करने के लिए  पुष्टि पत्र 

कोर्ट मैरिज के लिए क्या प्रक्रिया है?

एक बार जब आप कोर्ट मैरिज के लिए अपना आवेदन जमा करते हैं, तो उसका नोटिस 30 दिनों के लिए मैरिज रजिस्ट्रार के कार्यालय में एक प्रमुख स्थान (नोटिस बोर्ड) पर प्रदर्शित किया जाता है। इस अवधि के दौरान, किसी को अगर इस शादी से परेशानी है तो वह इस पर आपत्ति कर सकता है। आपत्ति आने पर रजिस्ट्रार उस पंजीकरण पर छानबीन करवाते हैं और अगर आपत्ति सही निकलती है तो शादी के डाक्यूमेंट्स को अमान्य भी कर सकते हैं। ये आपत्ति केवल  तभी लागू हैं जब वो देश कानून के खिलाफ हो। जैसे की यदि किसी शादी पहले हुई हो तो वो बिना पहले पार्टनर से डाइवोर्स (या मृत्यु प्रमाण) के बिना शादी नहीं कर सकते। माता पिता या किसी और की मर्ज़ी ना होना आपत्तियों में शामिल हैं। कुछ प्रदेशों में ये भी स्थापित करना पड़ सकता है की शादी के लिए कोई धर्म परिवर्तन नहीं कराया गया हैं। 

30-दिन की इस प्रक्रिया के बाद दोनों बालिगों को अपने साथ  तीन-तीन गवाहों को रजिस्ट्रार कार्यालय में लाना होता है वहां एक घोषणा पत्र मिलता हैं, जिसमें शादी करने के लिए दोनों पक्षों की सहमति होती है और इस पर हस्ताक्षर करने से विवाह की औपचारिकताएं पूरी हो जाती हैं। इसके बाद, मैरिज रजिस्ट्रार कोर्ट मैरिज सर्टिफिकेट में शादी का ब्योरा देता है, जो कि शादी की कार्यवाही होने के बाद 15 से 30 दिनों में कहीं भी जारी किया जाता है।

कोर्ट मैरिज के लिए आवेदन भरने से लेकर डेट बुक करने तक का कोई भी काम ऑनलाइन नहीं किया जा सकता है| औपचारिकताएं पूरी करने के लिए रजिस्ट्रार के ऑफिस में ही जाना होता है। अधिकतर, उप-मंडल मजिस्ट्रेट (एसडीएम) रजिस्ट्रार के रूप में कार्य करता है। तो, यह प्रक्रिया एसडीएम कोर्ट में होती है। कुछ मामलों में, डिस्ट्रिक्ट कलेक्टर (डीसी) भी एक रजिस्ट्रार के रूप में कार्य कर सकते हैं। यह शहर से शहर, राज्य से दूसरे राज्य में भिन्न होता है। कृपया अपने शहर के लिए जाँच करें।

क्या माता-पिता की सहमति आवश्यक है?

यदि दोनों साथी वयस्क हैं और विवाह योग्य आयु के हैं, तो माता-पिता की सहमति अनिवार्य नहीं है। हालांकि, परिवारों को शादी के बारे में सूचित करना ज़रूरी है।

यदि पार्टनर अलग-अलग जातियों, धर्मों या राष्ट्रीयताओं के हैं तो अदालत में विवाह की वैधता क्या है?

स्पेशल मैरिज एक्ट, 1954 के द्वारा धर्म की परवाह किए बिना कोई भी व्यक्ति विपरीत लिंग के व्यक्ति से कानूनी रूप से विवाह कर सकता हैइस कानून के तहत होने वाली शादी धर्म के पर्सनल लॉ द्वारा नहीं बल्कि धर्मनिरपेक्ष कानूनों द्वारा मान्य होती है।

इसी प्रकार, विवाह से उत्पन्न होने वाले अधिकार और कर्तव्य भी धर्मनिरपेक्ष कानून द्वारा लागू होते हैं और उत्तराधिकार भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम, 1925 द्वारा लागू होते हैं, कि व्यक्तिगत कानूनों द्वारा।

स्पेशल मैरिज एक्ट लागू करने का मुख्य मकसद था देश के साथ विदेश में रहने वाले भारतीयों को भी विवाह के लिए एक भरोसेमंद तरीका उपलब्ध कराना| इसके अनुसार, दो बालिग जो विदेश में रहते हैं, कुछ औपचारिकताएं पूरी करके दूल्हा और दुल्हन बन सकते हैं यानी शादी कर सकते हैं

स्पेशल मैरिज एक्ट, 1954 अनिवासी भारतीयों के लिए विशेष रूप से फायदेमंद साबित हुआ है क्योंकि यह विदेश में भारतीयों के विवाह को पंजीकृत करने और विवाह अधिकारियों (रजिस्ट्रार) के रूप में राजनयिक और काउंसलर नियुक्त करता है।

क्या कोर्ट मैरिज को हिंदू मैरिज एक्ट के तहत मान्यता दी जाती है या किसी जोड़े को वैधता के लिए हिंदू रीति-रिवाजों का पालन करने की जरूरत है?

कोर्ट मैरिज हिंदू मैरिज एक्ट के अंतर्गत मान्य नहीं हैं। लेकिन इसका शादी की क़ानूनी वैधता पर कोई फर्क नहीं पड़ता। कोर्ट मैरिज देश के कानून के हिसाब से रजिस्टर्ड होती है। 

अदालती विवाह की कानूनी मान्यता के लिए कोई भी अनुष्ठान (जैसे की फेरे या सिन्दूर) आवश्यक नहीं है।

कोर्ट मैरिज की वैधता क्या अन्य धर्मों के लोगों के लिए भी है?

सभी धर्मों में कोर्ट मैरिज मान्य है। भारत में शादियां या तो धर्म के अनुसार की जाती हैं या स्पेशल मैरिज एक्ट के अनुसार होती हैं। भारतीय कानून के अनुसार विवाह ऐसा कॉन्ट्रैक्ट है, जो दो बालिगों को एक साथ रहने का अधिकार देता है| कानून की नजर में दोनों ही तरह के विवाह मान्य हैं।

क्या आपको भी कोर्ट मैरिज करने के लिए कानूनी सहायता की आवश्यकता है? क्या एक वकील इस काम में मदद करने और इस प्रक्रिया से संबंधित औपचारिकताएं पूरी करने के लिए अपनी फीस ले सकता है?

हां, इस संदर्भ में कानूनी सहायता बेहद फायदेमंद हो सकती है क्योंकि एक वकील पंजीकरण प्रक्रिया के लिए आवश्यक सभी आवश्यक दस्तावेज तैयार करने में मददगार होता है। शादी के लिए दोनों पक्षों के बोझ और समय को कम करने में मदद करता है। जरुरत पड़ने पर वकील आगे के दावों और विचार-विमर्श के मामले में, पक्षकारों की ओर से अपील दायर करेगा और तर्क देगा। जाहिर है, एक वकील अपनी फीस वसूल करेगा लेकिन इसे युगल की भुगतान क्षमता के आधार पर निर्धारित किया जा सकता है।

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