18 + के लिए उचित

होली के नाम पर उत्पीड़न

Guy next door
जी हाँ, फिर से होली का अवसर है...वक्त है भारत की सारी महिलाओं का 'आधुनिक' कपड़े पहनने का और पुरुषों को इस अवसर पर मौज मस्ती करने की स्वीकृति देने का। भारतीय धर्मनिरपेक्ष विचारधारा को ध्यान में रखते हुए, सभी धर्म और जाति की महिलाएं इसमें भाग लेती है।

 गुबारों के निशानों पर वो अपने आप को भेट चढ़ा देती है। उन्हें अपने शरीर पर चोट लगने से मज़ा आता है। है ना? और शराब का एक या दो पेग लगाने के बाद, सब कुछ जायज़ भी है। जी हाँ, हमारी आदर्श बेटियां और बहने हर साल दिन गिनती है होली के आने का जिसमे वो इस सदियों से चली आ रही पारंपरिक प्रथा में हिस्सा ले सके। या शायद नहीं।

अगर आप अभी तक नहीं समझे तो मैं ही बता दो की मैं व्यंग्यात्मक होकर ये सब बोल रहा हूँ। कभी सोचा है की लड़कयाँ होली के अवसर से इतना डरती क्यूँ हैं? जी हाँ, मेरे प्यारे पुरुषों, चोकियें मत ये जानकर की भारत में अधिकांश महिलाएं इस रंगों के इस त्यौहार का बिलकुल इंतज़ार नहीं करती।

छेड़-छाड़ करने वालो के लिए समान मौका  

पिछली कुछ सालों की होली तक मुझे भी कुछ अंदाज़ा नहीं था की की महिलाएं होली के इतना खिलाफ क्यूँ है। हाँ, मेरी कुछ महिला दोस्त ज़रूर इस बारें में और दिल्ली की सड़कों पर गुबारों के आक्रमण की निंदा करती थी।  लेकिन ये शायद ज़िन्दगी का हिसा है। हैं ना?

बिलकुल बलात्कार और छेड़-छाड़ और हत्या की तरह - और ये सब मित्रवत ना होने की वजह से। है ना?    

इस आक्रमक दल का हिस्सा अलग अलग आयु वर्ग वाले कई पुरुष है, और निशाने पर लगे लोग भी अलग अलग आयु वर्ग के है।  जाति, धर्म, रंग या रूप के नाम पर कोई भेदभाव नहीं। इस मामले में छेड़-छाड़ करने वालो के लिए ये समान मौका है, जिसमें प्राथमिकता दी जाती है अकेले सफ़र रही महिलाओं को। 

हरामज़ादगी

मैंने अभी अपने एक दोस्त का फेसबुक पर स्टेटस पढ़ा जिसमे वो ये पूछ रहा है की त्यौहारों को ही एक ख़ास अवसर की तरह क्यूँ चुना जाता है लड़कियों और महिलाओं को छेड़ने के लिए और बुरा बर्ताव करने के लिए। और मेरे पास सच में इसका कोई अच्छा जवाब नहीं है।
तो जहाँ हमारे शिक्षा प्रद दक्षिणपंथी वैलन्टाइन डे और पश्चिमी प्यार के उत्सव के खिलाफ आतंक मचाने में लगे हुए है, हम उत्सव मनाते है पारंपरिक भारतीय हिंसा, छेड़-छाड़ और उत्पीड़न का।   

शायद कुछ दबी हुई कुण्ठा या नाराजगी है जो इन त्यौहारों के दौरान बहार निकलती है या शायद कुछ मर्दों की हरामज़ादगी जो की बाकि मर्दों को ऐसा करने के लिए प्रोत्साहित करती है। लेकिन आपको तो पता है ना की में पारखी नहीं हूँ। 

गन्दा मज़ा

में बस इतना है कह सकता हूँ की समय आ गया है हम पुरुषों को अपने अन्दर झांकने का और अपनी गलतियाँ मानाने का। होशहवास में या उत्कृष्ट ढंग से, हम में से काफी उन चीज़ों का हिस्सा बन जाते है जो किसी बाहर वाले के लिए शारीरिक sexual harassment हो। बस क्यूंकि बाकी सब ये कर रहे है, इसका मतलब ये तो नहीं ना की होली के अवसर पर हमें छेड़-छाड़ करने का फ्री मौका मिल गया हो।

अब मुझे पानी पार्टी खराब करने वाला पागल मत समझिये। होली का त्यौहार वाकई में इस अच्छा और मजेदार अवसर है, खासकर क्यूंकि इसमें पानी, सफ़ेद कपड़े, शराब और भांग जैसे मज़ेदार चीज़ें शामिल है। और 'गंदे' मज़े के कारण कम। 

हीरो बनो

लेकिन आपको एहसास है किसी दूसरे को दुःख देकर अगर आप मज़े लेते हो तो ये उत्पीडन है। हो सकता है ऐसे पुरुष और महिलाएं हो जो आपकी तरह गन्दी होली खेलना चाहते हो, खासकर आपके साथ। ऐसा नहीं है की महिलाओं को होली का त्यौहार पसंद नहीं, उन्हें नापसंद है त्यौहार के नाम पर छेड़-छाड़।

क्यूंकि होली की यादें होनी चाहिए रंग और उत्सव, ज़बरदस्ती और छेड़-छाड़ नहीं। इसलिए, आगे बढ़ो, हीरो बनो। इस होली पर, सहमति-जन्य बनिए. बुरा मत कीजिये - होली है!

 

फोटो: कुबेर शर्मा, © Love Matters/RNW

इस ब्लॉग में व्यक्त किए गये विचार Love Matters/RNW  के भी हों, ये आवश्यक नहीं।

क्या होली पर छेड़-छाड़ आपको नापसंद है? अपने विचार यहाँ बताइए या फेसबुक पर चर्चा का हिस्सा बनिए।

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